ज़िंदगी हमारी भले ही कहीं खो गई है






ज़िंदगी हमारी भले ही कहीं खो गई है
पर तुम्हारी आदत हमें हो गई है।

जो लम्हें हमें दूर करेंगे कभी
उन लम्हों से शिकायत हो गई है।

जो तुम्हारी ख़ुशी में शामिल नहीं होंगे
उन सब से बगावत कर ली गई है।

खुदा मुश्किलों से तुम्हें दूर रखे
ऐसी हर दुआ माँग ली गई है।

जो निशान तुम्हारी आँखों को चुभ जाए
उनकी सज़ा मुक्कमल कर दी गई है।

जो शमा कभी बुझ गए थे
उन्हें फिर जला दी गई है।

तुम्हारे लबों की हँसी देख सकें
इसलिए महफ़िलें सज़ा दी गई हैं।

यार मेरे अब आ भी जाओ
हमें तुमसे मोहब्बत हो गई है।


          -सतीश कुमार

Satish Kumar

Hi, I am a student but have a passion for writing and singing. So here is a collection of some immature kavita,gazal and shayeri written by me.

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