कल तक




कल तक जिनसे मैं अन्जान था
आज वो मेरी जान बन बैठे हैं,
कभी जिनसे मैं सब कहता था
आज वही मेरा राज़ बन बैठे हैं।

कल तक जिनसे मैं भागता था
आज उन्हीं के साथ रहता हूँ,
तन्हाईयाँ जब मेरा दरवाज़ा खोलती हैं
मैं हमेशा उसे उन्हीं के साथ मिलता हूँ।

कल तक जो 'हाय' लिए फिरता था
आज उन्हें सुकून में गिनता हूँ,
अब जो पल थोड़े उदास होते हैं
उन्हें पैन पे उतारकर छोड़ देता हूँ।

कल तक मैं साए के पीछे भागता था
आज साया मेरे पीछे है
अब अच्छे से सम्भाल के रखता हूँ
ज़िंदगी से मैंने जो भी पाया है।

कल तक मैं  किताबे पड़ता था
आज कल चहरे पढ़ रहा हूँ,
अब चहेरे ही सबकुछ बताते हैं
उनका बताया जहन में उतार लेता हूँ।

कल तक जो मुझे दिक्कारते थे
आज उन्हें अपनी प्रेरणा मानता हूँ,
अब जिस पल में ऐसा होता है
उस पल को 'सुनहरा' कहता हूँ।

कल तक मैं आंधिओं से परे था
आज उन्हें समझ पाया हूँ,
उड़ गए थे जो ख्याब मेरे
उन्हें मैं फिर समेट लाया हूँ।

कल तक कुछ न होने का अफ़सोस था
आज मन मस्त-मगन ही पाया हूँ,
ज़िंदगी को हँस के जीना है
यह बात अब सबको समझता हूँ।

कल तक चलने के लिए सहारा ढूंढ़ता था
आज किसी का सहारा बनना चाहता हूँ,
इस जहाँ में आधे मुर्दे चलते हैं
यह बात मैं अब समझ पाया हूँ।


          कवि -सतीश कुमार 

Satish Kumar

Hi, I am a student but have a passion for writing and singing. So here is a collection of some immature kavita,gazal and shayeri written by me.

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