कितनी लम्बी रात है





कितनी लम्बी रात है, इन हवाओं में कुछ बात है,
इन्हें छूकर गुजरना ता मुझे, अब पास बैठी मेरे साथ हैं।

कहें, हैं किस हाल में, बयाँ करे चल साथ में,
रंग उतर जाएगा सबका, क्योंकि हम दोनों साथ हैं।

मौसम भी बदनाम हैं, आपने रंग बिरंगे पहनावे से,
कहीं धूप कहीं छाव दे, ढलपाती न सबके साथ है।

बरसों बरस जो न बदले, किसी की दिवानगी में,
तू ही एक चीज़ यहाँ, जो रहती सबके साथ है।

कहीं आग भी लगा दे, कहीं आग को बुझा दे,
देखी नहीं ऐसी रवानगी जो करती सबकुछ साथ है।

तू सबकी ज़रूरत हैं, तेरी ज़रूरत कोई न समझे,
फिर भी तू उफ़ न करती, चलती सबके साथ है।

महरूम नहीं मैं, तेरे अंदर की उफनती आवाज़ से,
जब दहाड़े शेरनी सी, ले उड़े सबको आपने साथ है।

आगे बढ़ जाना जब, कोई तेरे  बारे में पूछे,
भूल के भी न बताना,जो तुझमें तेरा राज़ है।


          -सतीश कुमार

Satish Kumar

Hi, I am a student but have a passion for writing and singing. So here is a collection of some immature kavita,gazal and shayeri written by me.

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